Sonam Wangchuk से क्यूं नहीं मिल रहे Rahul Gandhi | Bharat Ek Nayi Soch
जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का अनशन जारी, पर राहुल गांधी और विपक्ष क्यों साधे हैं चुप्पी?
नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर पर्यावरणविद सोनम वांगचुक का अनशन लगातार जारी है। लद्दाख की संवैधानिक सुरक्षा और उसके भविष्य को लेकर उनकी यह तपस्या देश भर का ध्यान अपनी ओर खींच रही है, लेकिन इस महत्वपूर्ण आंदोलन से राहुल गांधी सहित अन्य प्रमुख विपक्षी नेताओं की गैरमौजूदगी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। आखिर क्यों, इस जन आंदोलन पर विपक्ष ने खामोशी अख्तियार कर रखी है?
सोनम वांगचुक लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं। उनका यह अनशन लद्दाख की पहचान, उसके प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक प्रबल आवाज बन चुका है। यह आंदोलन न केवल लद्दाख, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक और पर्यावरणीय चेतना के लिए महत्वपूर्ण संदेश दे रहा है।
हालांकि, जब भी देश में कोई बड़ा जन मुद्दा या आंदोलन खड़ा होता है, विपक्ष तुरंत अपनी सक्रियता दिखाता है और सरकार को घेरने का प्रयास करता है। ऐसे में, सोनम वांगचुक जैसे राष्ट्रीय स्तर के सम्मानित व्यक्ति के इस बड़े आंदोलन से राहुल गांधी और कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष का दूर रहना चौंकाने वाला है। यह खामोशी तब और भी अधिक चुभने वाली है, जब विपक्ष लगातार केंद्र सरकार पर जनता के मुद्दों से मुंह मोड़ने का आरोप लगाता रहा है।
इस असामान्य चुप्पी के पीछे सियासी गलियारों में कई अटकलें लगाई जा रही हैं। एक बड़ी चर्चा यह है कि क्या यह अनुपस्थिति पत्रकार अभिजीत दीप्के के किसी पुराने ट्वीट से जुड़ी है? सवाल उठता है कि क्या किसी एक व्यक्ति के सोशल मीडिया पोस्ट की वजह से राहुल गांधी और कांग्रेस, लद्दाख जैसे संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे से किनारा कर रहे हैं?
यह स्थिति विपक्ष की नीयत पर भी सवाल उठाती है। क्या विपक्ष केवल उन्हीं मुद्दों को अपना समर्थन देता है, जिनमें उसे सीधा सियासी फायदा नजर आता है? क्या यह सच है कि वे अपने राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दों का चयन करते हैं और ऐसे आंदोलनों से दूर रहते हैं, जहां उन्हें तात्कालिक चुनावी लाभ नहीं दिखता? ‘भारत एक नई सोच’ की बेबाक पत्रकारिता इस गंभीर प्रश्न को उठाती है, क्योंकि जनता अब इन सवालों के जवाब जानना चाहती है।
सोनम वांगचुक की लड़ाई सिर्फ लद्दाख के लिए नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और पर्यावरणीय संरक्षण की भी है। ऐसे में, विपक्ष की यह रहस्यमयी खामोशी उनकी विश्वसनीयता पर भारी पड़ सकती है। जनता जानना चाहती है कि आखिर वे जंतर-मंतर पर लद्दाख की आवाज बनने से क्यों कतरा रहे हैं और इस पर उनका वास्तविक रुख क्या है।







































































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